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वजूद की राख

सिकंदर भइया की जब शादी हुई, तो रूही भाभी की उम्र बमुश्किल सोलह बरस रही होगी। वो बिल्कुल किसी कच्ची कली की तरह थीं—सहमी हुई, नाज़ुक, और ऐसी ग...

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बिन ब्याही रुख़सती

आँगन के उस सीलन भरे कोने में रखा लकड़ी का पुराना अड़्डा आज फिर कस दिया गया था। उस पर लाल सुर्ख़ रेशम का कपड़ा ऐसे तना हुआ था जैसे किसी बेबस क...

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चाय का दूसरा कप

हमारे मोहल्ले में चाय हमेशा दो कप बनती थी। एक अब्बा के लिए और एक अम्मी के लिए। बाक़ी लोगों की चाय का कोई हिसाब नहीं था। कोई आ गया तो तीसरा...

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